देहरादून | Dehradun

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देहरादून जिला उत्तराखण्ड की अस्थायी राजधानी है। राज्य निर्माण के बाद यह पहला शहर था जिसे नेताओं ने शासन- प्रशासन के अपने कामकाज के लिए तय किया। दून घाटी में बसा देहरादून जिला अपने में अनुपम सौंदर्य को समेटे है। इस ब्लॉग के माध्यम से हम आपको देहरादून जिले के हर पहलू से रूबरू कराऐंगे। हमारी कोशिश है कि देहरादून को जानने की आपकी इच्छा व देहरादून के विषय में सभी तथ्यात्मक जानकारी एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने का हमारा प्रयास, इस ब्लॉग के माध्यम से दोनो ही सार्थक होगें।

हमने अपनी सभी जिलों को समझने व सटीक तरीके से जानने के लिए कुछ निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा है। प्रत्येक श्रेणी एक विशेष विषय पर होगी। जिसकी मदद से आप आसानी से देहरादून के मनचाहे विषय को पढ़ सकते हैं।

देहरादून का परिचय | Introduction to Dehradun

स्थापना 1817
मुख्यालय  देहरादून
विस्तार 29 ° 57 ‘ उत्तरी अक्षांश से 31 ° 2 ‘ उत्तरी अक्षांश तथा 77 ° 35 ‘ पूर्वी देशान्तर से 79 ° 28 ‘ देशान्तर तक
कुल क्षेत्रफल  3,088 वर्ग किमी
कुल जनसंख्या 803,983 (2018)
जनघनत्व 1,900 किमी2 (5,000 वर्गमील)
साक्षरता दर 89.32%
भाषाएँ  हिन्दी, गढ़वाली, अंग्रेजी
विधानसभा क्षेत्र  10
तहसील  7
ब्लॉक  6
गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग  307
शासन प्रणाली  मेयर कांउसिल
मेयर सुनील  उनियाल गामा
म्युनिसिपल कमिश्नर  विनय शंकर पाण्ड़े
राष्ट्रीय उद्यान  राजाजी राष्ट्रीय उद्यान | Rajaji National Park
वन्यजीव मसूरी वन्य जीवविहार | Mussoorie wildlife sanctuary
संरक्षण आरिक्षिति आसन वेटलैंण्ड संरक्षण आरिक्षिति | Aasan Wetland Conservation Reserve
मुख्य नदियाँ गंगा, यमुना, सांग , टौंस, बिन्दल, वाल्दी, कैराना पहाड़ी, खतनु आदि
मुख्य फसलें बाजरा, मण्डुआ, झंगोरा, उड़द, अरहर, गन्ना, गेहूँ
खनिज पदार्थ जिंक, डोलोमाइ, चूना – पत्थर, जिप्सम, संगमरमर, ताँबा, सीसा
मुख्य मन्दिर टपकेश्वर महादेव, ड़ाट काली, ज्वाला जी, चन्द्रबनी, महासू देवता मंदिर (हनोल)
जल प्रपात जल प्रपात, मैसी फाल, टाइगर फाल
भट्टा फाल, हार्ड़ी प्रपात, झंड़ी पानी फाल
ऊँचाई 430 m (1,410 ft)
पिन कोड़ –
248001
टेलीफोन कोड़ +91-135
वाहन पंजीकरण UK-07
Website dehradun.nic.in

देहरादून का इतिहास | History of Dehradun

देहरादून नगर बाह्य एवं मध्य हिमालय के बीच स्थित दून घाटी में बसा हैं। मेरठ मण्डल के अन्तर्गत इसे जिला बनाकर 1817 में सम्मिलित किया गया गया। गढ़वाल मण्डल में देहरादून को 1975 में शामिल किया गया। नगर निगम की स्थापना देहरादून में 9 दिसम्बर 1998 को की गई। वैदिक साहित्य के अनुसार आर्यों से पूर्व इस भूमि पर असुर जाति के लोग रहते थे। मान्यता है कि महाभारत काल में यहाँ ( वर्तमान टपकेश्वर के पास ) आचार्य द्रोण का आश्रम था। इसी कारण इस घाटी को द्रोण घाटी के नाम से जाना जाता है।

गुरु रामराय ने यहाँ 1699 में एक गुरुद्वारा बनवाया था जो कि आज नगर के केन्द्र में है। शायद गुरु रामराय द्वारा यहां डेरा डालने की वजह से भी यह स्थान देहरादून के नाम से विख्यात हो गया। कुछ लोगों का मानना है कि गुरु रामराय द्वारा यहां देह त्यागने के कारण इसका नाम देहरादून पड़ा।

कुछ इतिहासकारों की माने तो इस स्थान का नाम पृथ्वीपुर था। गढ़वाल नरेशों ने यहाँ 1804 तक शासन किया। उसके बाद 1804 से 1815 तक यह स्थान गोरखों के अधीन हो गया व 1815 से स्वतंत्रता तक ब्रिटिश शासकों के अधीन रहा।

देहरादून के मुख्य पर्यटन स्थल | Top famous tourist places of Dehradun

गुच्चूपानी | Robber’s Cave, Dehradun

गुच्चू पानी जिसे लोग ‘रोबर्स गुफाएं’ (Robber’s Cave) के नाम से भी जानते हैं, देहरादून से करीब 8 किमी दूर पहाड़ों व जंगलों से आच्छादित एक खूबसूरत स्थान पर स्थित प्राचीन गुफाएँ हैं। 
रोबर्स गुफाएं 600 मीटर लंबी गुफाएँ हैं। इन गुफाओं में छोटे झरने हैं व साथ ही एक नदी भी बहती है। जिसमें चलकर लोग झलने तक जाते हैं। जो कि पर्यटकों को रोमांच से भर देता है। ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजों के जमाने में लुटेरे इस गुफा का उपयोग अपने ठिकाने के लिए करते थे। इसी कारण से इस जगह का नाम रोबर्स गुफाएं पड़ा। पानी में संकरी गुफाओं से होकर गुजरना काफी डरावना भी लगता है जो कभी न भूलने वाला एहसास से भर देता है। यह गुफाएँ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर विशेष स्थान दिया प्राप्त कर चुकी हैं।

मुख्य आकर्षण - गुफाएँ, झरने, फोटोग्राफी व सुंदर प्राकृतिक नजारे
टिकट -
समय - सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक
समयावधि - 2 घण्टे

मालसी डियर पार्क | Malsi Deer Park, Dehradun

देहरादून मुख्य शहर से 10 किमी दूरी पर मसूरी मार्ग पर स्थित मालसी डियर पार्क एक बेहद खूबसूरत वन्यजीव पार्क है। जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास की सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखकर बनाया गया यह छोटा सा पार्क बच्चों व परिवार के संग घूमने के लिए शहर के पास में ही स्थित एक अच्छा विकल्प है। देहरादून स्थित मालसी डियर पार्क को अब चिड़ियाघर के रूप में भी जाना जाने लगा है। बदलते स्वरूप में हिरणों को उनके प्राकृतिक आवास में देखने का यह पार्क एक सुअवसर प्रदान करता है। 25 हेक्टेयर के क्षेत्र में फैले मालसी डियर पार्क में पक्षी और अन्य जानवर भी हैं लेकिन उन्हें एक पिंजरे में बंद रखा जाता है।

इस जंतु उद्यान में वन्यजीवों के साथ-साथ पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ भी हैं। वर्तमान समय में बच्चों को पर्यावरण, वन्यजीवों व प्रकृति के साथ जोड़ने व उनके स्वस्थ मानसिक विकास के लिए मालसी डियर पार्क अपने आप में सबसे सुंदर स्थान है। देहरादून – मसूरी मार्ग पर सड़क से गुजरते ही इस जंतु उद्यान पर नजर पड़ जाती है। अतः यात्री स्वतः ही यहाँ कुछ देर भ्रमण कर मन को प्रफुल्लित करने के लिए लालायित रहते हैं।

मुख्य आकर्षण - वन्यजीव व प्राकृतिक नजारे
खुलने का समय - 10 AM – 5 PM
टिकट -  Adult Rs 20/-, Kids Rs 10/-
देहरादून शहर से दूरी - 10 किमी
Exploration Time: 3 Hours.

सहस्त्रधारा | Sahastradhara (Thousand Fold Spring)

सहस्त्रधारा (Sahastradhara) नाम का शाब्दिक अर्थ ‘कई सौ झरनो वाला स्थान’ (Thousand Fold Spring) है। देहरादून में सहस्त्रधारा (Sahastradhara) एक प्रसिद्ध लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। गंधक युक्त जल वाला यह प्राकृतिक स्थल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। अनेक समूहों में धाराएँ बहने के कारण इस स्थल को सहस्रधारा के नाम से जाना जाता है। यह देहरादून से 11 किमी दूर बाल्दी नदी तट पर है। प्रकृति के मनमोहक नजारों के बीच, बाल्दी नदी पर स्थित यह पर्यटन स्थल निरंतर बहते झरनों के लिए प्रसिद्ध है। इन कई सौ छोटे-छोटे झरनों को एकसाथ बहते देखना पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। एक और बात जो सहस्त्रधारा को खास बनाती है वह है इसका सल्फर युक्त पानी। जो अपने में अनगिनत औषधीय गुण समाए है।  मानसून के मौसम में दौरान, इन झरनों की खूबसूरती देखते ही बनती है। नेचर फोटोग्राफी करने वालों के लिए यह एक बेहतरीन जगह है।

मुख्य आकर्षण  - झरने व शांत प्राकृतिक वातावरण
खुलने का समय - हर वक्त खुला रहता है
समयावधि - 2 से 3 घण्टे
टिकट/ प्रवेश शुल्क - मुफ्त
देहरादून से दूरी - 11 किमी

राजाजी राष्ट्रीय पार्क | Raja ji National park

सन् 1983 में स्थापित और 820.42 वर्ग किमी. क्षेत्रफल में फैला राजाजी राष्ट्रीय पार्क जनपद देहरादून, हरिद्वार व पौड़ी जिलों में फैला है। तीन वन्य जीव विहारों मोतीचूर, चीला एवं राजाजी को मिलाकर बनाया गए इस पार्क में 23 प्रकार के स्तनधारी (हाथी, शेर, चीतल, टाइगर, नीलगाय आदि) वन्य प्राणी एवं 313 प्रकार के पक्षी पाये जाते हैं। यहाँ विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों में साल, खैर, शीशम, झींगन, खरपट, बाकली, सैन, चीड़, सिरस, रोहणी, अमलतास आदि प्रमुख हैं। इसका नाम भारत के अन्तिम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती सी. राजगोपालाचर्य के नाम पर रखा गया है। इसका मुख्यालय देहरादून है।

मसूरी | Mussoorie

ऊँची पहाड़ियों से घिरी, ऊपर से पदतल में द्रोण-घाटी एंव शिवालिक पहाड़ियों को झाँकती इस सुन्दर स्वास्थ्यप्रद स्थली ने सर्वप्रथम अंग्रेजों को और उसके बाद भारत के महाराजाओं को अपनी खूबसूरती की ओर आकर्षित किया। देहरादून से 35 किलोमीटर दूर 6,500 फीट की ऊँचाई पर बसी मसूरी उत्तराखण्ड की सर्वोत्तम पर्वतीय बस्ती है। इसे पर्वतीय स्थानों की रानी कहा जाता है। यह नगरी अपने प्राकृतिक वैभव के कारण भारत के प्रमुख पर्वतीय नगरों एवं पर्यटक केंद्रों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। जहाँ वर्तमान मसूरी नगर बसा है वहाँ पूर्व में बाँज-बुराँस का सघन वन था जहाँ पशु-पक्षियों की बहुलता थी।

यहाँ पर्यटकों की सुविधा के लिए रज्जू मार्ग भी है। कैम्पटी फॉल यहाँ का विशेष आकर्षण है। यह नगर अपने सौंदर्य और प्राकृतिक छटा के लिए प्रसिद्ध है। गर्मियों में मसूरी का मौसम सुंदर और आकर्षक होता है। यहां देश-विदेश के हजारों सैलानी गर्मी के मौसम में ठहरने के लिए और शरद काल में हिमपात का आनंद लेने के लिए आते हैं। मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी स्थित है, जहाँ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अतिरिक्त कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कॉलेज और स्कूल भी हैं।

65 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला मसूरी, हिन्दुस्तान के सबसे पुराने हिल स्टेशनों में एक है। मसूरी शहर के असली संस्थापक ईस्ट इण्डिया कम्पनी की बंगाल आर्मी में काम करने वाले आयरिश अफसर कैप्टन यंग आदि थे। कैप्टन यंग ने मसूरी की खोज 1825 में की और अंग्रेजों ने यहाँ की भूमि को टिहरी नरेश सुदर्शन शाह से 80 वर्ष लिए पट्टे पर ली थी। 1827 में यहाँ की पहली इमारत मलिंगार होटल बनीं थी। 1832 में भारत के सर्वेयर जनरल कर्नल एवरेस्ट ने यहाँ सर्वेक्षण कार्यालय स्थापित किया था।
चीन अधिकृत तिब्बत से निर्वासित होने के बाद वर्ष 1959 में तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा सबसे पहले मसूरी ही आए थे। यहीं तिब्बत की पहली निर्वासित सरकार बनी थी। बाद में वे हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला के पास मैक्लोडगंज स्थानांतरित हो गए।

यह उत्तर पूर्व में हिमालयन पर्वत श्रृंखलाओं के आश्चर्यजनक दृश्य को प्रस्तुत करता है। मसूरी अपने प्राकृतिक सौन्दर्य, प्रफुल्ल सामाजिक जीवन एंव मनोरंजन के लिए प्रसिद्ध है। मसूरी गंगोत्री एवं यमुनोत्री के मन्दिरों का प्रवेश द्वार है। यहाँ की सबसे ऊँची चोटी गनहिल पहाड़ी है। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में कैम्पटीफाल, मैसी फाल, चकराताफाल, भट्टाफाल, हार्डीफाल, केमल्स बैक, म्यूनिसिपल गार्डन, सरजार्ज एवरेस्ट हाउस, नाग टिब्बा, तोप टिब्बा, धनोल्टी, नागदेवता मंदिर, सुरकंदा देवी मंदिर, ज्वालाजी मंदिर, तिब्बती स्तूप, हैपी वैली, बेनोग हिल, आब्जरवेटरी, क्वेल सेंचुरी, क्लाउडएंड, वन चेतना केन्द्र, लंबोर बाजार और कुलड़ी बाजार प्रसिद्ध हैं।

दुर्लभ विंटर लाइन (Winter Line)

पर्वतों की रानी मसूरी की नैसर्गिक सुंदरता में चार चांद लगाने का कार्य दुर्लभ विंटर लाइन करती है। प्रकृति की यह अद्भुत घटना आमतौर पर दिसंबर-जनवरी माह में नजर आती है। विंटर लाइन वास्तव में एक विशेष प्रकार का नेचुरल फिनोमिना है, जिसके अंतर्गत पश्चिम दिशा में अस्त हो रही सूर्य की लालिमा एक लाल रंग की कई किलोमीटर लंबी क्षैतिज रेखा की भांति दिखाई पड़ती है।

कैम्पटी फॉल | Kempty Falls

यमुनोत्री मार्ग पर मसूरी से 15 किमी की दूरी पर टिहरी जिले के अंतर्गत मसूरी की मनोहर पहाड़ियों में स्थित कैम्पटी फाॅल में 50 फुट की ऊँचाई से गिरता हुआ यह सर्वाधिक मनोहर एंव विशाल जल प्रपात प्रकृति का एक अनुपम उपहार है। इसे करीब से देखना आपको रोमांच से भर देता है। शायद ही कोई ऐसा प्रकृति प्रेमी हो जिसने कैम्पटी फाॅल का नाम न सुना हो।

ऋषिकेश | Rishikesh

उत्तराखण्ड के देहरादून जिले का पूर्वी नगर ऋषिकेश एक ऐसा धार्मिक पर्यटन स्थल है जो संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। हर साल देश-विदेश से लाखों लोग इस धर्मनगरी के दर्शन करने आते हैं। पर्वतराज हिमालय की ऊँची गहरी घाटियों का सफर तय कर व गगनचुंबी पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ गंगा नदी पहली दफा ऋषिकेश से ही समतल मैदानों में प्रवेश करती है। अपने धार्मिक व आध्यात्मिक शांत वातावरण के लिए जाना जाने वाला ऋषिकेश भारत का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल है। शिवालिक पहाड़ियों व प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को संजोए ऋषिकेश समुद्रतल से लगभग 1,360 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। माँ गंगा के प्रवेश से ऋषिकेश की धरती और भी पावन व वंदनीय हो जाती है। ऋषि-मुनियों की तपस्थली ऋषिकेश की इसी पुण्य भूमि से उत्तराखण्ड के पवित्र चार धाम यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ व केदारनाथ की धार्मिक यात्रा प्रारंभ होती है।

ऋषिकेश नाम पड़ने की ऐतिहासिक जनश्रुति –

प्राचीनकाल से ही यह नगरी ऋषि मुनिओं की तपस्थली और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रही हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रैभ्य मुनी द्वारा इस स्थान पर इंद्रियों को जीतकर ईश्वर को प्राप्त किया गया, इसलिए इस स्थान का नाम हृषिकेश (इंद्रियों का स्वामी – विष्णु) पड़ा। उच्चारण दोष के अब इसे ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने मधु – कैटभ दैत्य का वध गंगा नदी के दाहिने तट पर स्थित ऋषिकेश में ही किया था। अतः तब से यह स्थान प्रसिद्ध हो गया।

पौराणिक कथाओं प्रचलित किवदंतियाँ प्रचलित है कि गंगा तट पर ऋषिकेश का पौराणिक नाम कुब्जाम्रक माना जाता है। केदारखंड के अनुसार मुनि रैभ्य ने आम के पेड़ का आश्रय लेकर कुब्जा रूप से भगवान के दर्शन किए थे। अतः उसी दिन से इस स्थान का नाम कुब्जाम्रक पड़ा जो बाद अपभ्रंश होकर ऋषिकेश कहलाया। केदारखंड पुराण में प्राप्त वर्णन के अनुसार ब्रह्मकुंड के बाद कुब्जाभ्रक तीर्थ क्षेत्र प्रारम्भ होता है, जो वर्तमान का ऋषिकेश है।

एक अन्य कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकला विष भगवान शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें ‘नीलकंठ महादेव’ के नाम से जाना गया।

ऋषिकेश को भगवान राम से जोड़कर भी देखा जाता है। किंवदंती है कि भगवान राम ने अपने वनवास काल के समय यहाँ जंगलों में अपना समय व्यतीत किया था। वर्तमान में भी ऋषिकेश के प्रसिद्ध ‘राम झूला’ व ‘लक्ष्मण झूला’ इस बात का सजीव इसका प्रमाण माने जाते हैं।

विश्व योग राजधानी, ऋषिकेश | World Yoga Capital | Rishikesh

योग, आयुर्वेद, हिंदू धर्म एंव अन्य अध्यात्मिक पहलुओं में रूचि रखने वालों की पसंदीदा जगह ऋषिकेश देहरादून का एक उप-नगर है, जो कि हरिद्वार से 24 किमी दूरी पर टिहरी – देहरादून बार्डर पर गंगा एवं चन्द्रभागा नदी के संगम पर स्थित है। पर आध्यात्मिक शहर के रूप में पूरे विश्व में पहचाना जाता है। दूसरे अर्थों में योग का पूरी दुनिया में प्रचार प्रसार करने वाला ऋषिकेश योग नगरी भी कहलाता है। विदशों से हर साल लाखों सैलानी योग व अध्यात्म की शिक्षा लेने के लिए ऋषिकेश पधारते हैं। यहाँ योग की विभिन्न संस्थानों में बहुत सी योग कक्षाएँ संचालित होती हैं। भारतवर्ष में जब भी कोई योग व अध्यात्म की बात करता है तो ऋषिकेश का जिक्र स्वतः ही हो जाता है।

ऋषिकेश में स्थित दर्शनीय स्थल | Top famous places to visit in Rishikesh

राम झूला | Ram Jhula Bridge | Rishikesh

ऋषिकेश मुख्य शहर से 5 किमी की दूरी पर गंगा नदी के ऊपर बना राम झूला ऋषिकेश की खास पहचान है। दूर से ही नजर आता राम झूला विश्व प्रसिद्ध झूलता हुआ पुल है। इसका निर्माण सन् 1986 में किया गया था।

राम झूला की एक ओर दूसरी ओर की कुल लम्बाई 140 मीटर व चौड़ाई 22 मीटर है।

राम झूला पौड़ी गढ़वाल व देहरादून जिले को जोड़ता है।मुनि की रेती पर स्थित शिवानंदा आश्रम को

गंगा नदी के दूसरी ओर गीता भवन, परमार्थ निकेतन व स्वर्गाश्रम स्थित अन्य मंदिरों को आपस में जोड़ता बीच यह एक महत्वपूर्ण पुल है।

राम झूला एक पैदल यात्री झूला पुल है। जिसमें भारी वाहन वर्जित हैं। पर कभी-कभी इस पर मोटरसाइकिलें गुजरती हुई दिख जाती हैं।

राम झूला के पास ही लक्ष्मण व रघुनाथ मंदिर निर्मित हैं।

राम झूला पर खड़े होकर गंगा नदी को निहारा व प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेना यहाँ आने वाले सैलानियों की पहली पसंद होती है। पर्यटक इस पुल पर खड़े होकर खूब सारी फोटोग्राफी भी करते हैं।

लक्ष्मण झूला | Lakshman Jhula Bridge | Rishikesh

राम झूला से लगभग 2 किमी गंगा नदी के ऊपर आगे की ओर ‘लक्ष्मण झूला’ भी राम झूला से मिलता-जुलता पुल है। यात्री अक्सर लक्ष्मण झूला को, राम झूला मानने की गनती कर बैठते हैं। जो सर्वाधिक प्रसिद्ध है वह राम झूला है।

मुनि की रेती | Rishikesh

मुनी की रेती में दिव्या जीवन संघ, कैलाश आश्रम, विट्ठल आश्रम, ओंकार आनंद संस्थान आदि कई महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं, जो योग, ध्यान, संस्कृत, धार्मिक तथा उच्च तकनीकी शिक्षा प्रदान करती है। गढ़वाल मण्डल विकास निगम का यात्रा कार्यालय व टूरिस्ट गेस्ट हाउस इसी क्षेत्र में है। इसी क्षेत्र में इस्कॉन अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा संचालित श्री राधा गोविंद का भव्य मंदिर है। यहां विदेशी पर्यटक बहुत संख्या में आते हैं।

ऋषिकेश के उत्तरी छोर पर टिहरी जिले में यह स्थान गंगा के दायीं ओर स्थित है। इसके सामने गंगा के बाएँ ओर पौड़ी में स्वार्गाश्रम, गीताश्रम, गीता भवन (गीता प्रेस का) तथा भूतनाथ का मंदिर आदि है।

चौरासी कुटिया | Chaurasi Kutia | Beatles Ashram| Rishikesh

चौरासी कुटिया आश्रम जिसे आज राजाजी टाइगर रिजर्व द्वारा नेचर सेन्टर के रूप में विकसित किया गया है पूर्व में भारत की प्राचीन योग विद्या का केंद्र रहा था। यहाँ बीटल्स सहित अनेक प्रसिद्ध लोगों ने ध्यान सीखा।
स्वर्गाश्रम के निकट महर्षि महर्षियोगी द्वारा भावातीत ध्यान हेतु इस केन्द्र (शंकराचार्य नगर) की स्थापना 1967 में की गई थी। यहाँ विदेशी लोग ध्यान करने आया करते थे। आश्रम द्वारा छोटी-छोटी चौरासी कुटिया सीमेंट से निर्मित की गई है। इसलिए इसे 84 चौरासी कुटी कहते हैं। 1985 से यह केन्द्र बन्द रहा है। राज्य सरकार की पहल पर 8 दिसम्बर 2015 से इसे खोल दिया गया है। लगभग डेढ वर्ग किमी क्षेत्र में फैले इस क्षेत्र में प्रवेश हेतु शुल्क लगाया गया है।

त्रिवेणी घाट | Triveni ghat | Rishikesh

धर्मनगरी ऋषिकेश के सबसे पवित्र एंव महत्वपूर्ण घाटों में एक त्रिवेणी घाट है। नाम से ही अर्थ स्पष्ट होता प्रतीत होता है कि यह पवित्र त्रिवेणी घाट तीन नदियों के संगम का स्थान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रिवेणी घाट में भारत की तीन पवित्र नदियो गंगा, यमुना व सरस्वती का संगम होता है। तीन नदियों के संगम स्थल होने के कारण इसे त्रिवेणी घाट के नाम से जाना जाने लगा। हिंदू मान्यताओं के अनुसार त्रिवेणी घाट में ड़ुबकी लगाने से सभी पाप मिट जाते हैं व पुण्य की प्राप्ति होती है।

प्रतिदिन शाम को त्रिवेणी घाट में माँ गंगा सहित यमुना व सरस्वती की भव्य आरती होती है। लोग दूर-दूर से इस आरती में शामिल होने आते हैं। आरती के दौरान संपूर्ण घाट का वातावरण आध्यात्मिक व भक्तिमय हो जाता है।

त्रिवेणी घाट मुख्य परिसर में महाभारत युद्ध में अर्जुन के सारथी बने श्रीकृष्ण व अर्जुन की रथ पर विराजमान हुए एक सुंदर विशाल मूर्ति है। जो दूर से ही पर्यटकों का ध्यान आकर्षित कर देती है। वहीं दूसरी ओर भगवान् शिव की जटाओं से माँ गंगा को धरती पर अवतरित होते हुए दिखाई दिया है।

त्रिवेणी घाट में आकर कई लोग ध्यान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस संगम स्थली पर ध्यान आसानी से लग जाता है।

स्वर्ग आश्रम | Rishikesh

ऋषिकेश धर्मनगरी की सबसे अधिक चहल-पहल व मुख्य आकर्षण का केंद्र अगर कोई स्थान है तो वह स्वर्ग आश्रम है। सुंदर दुकाने, शुद्ध शाकाहारी भोजन के रेस्टोरेंट, धार्मिक किताबों के स्टाॅल, ध्यान केंद्र, खूबसूरत मंदिर इत्यादि यहाँ बहुतायत में है। वैसे यह स्थान पौड़ी गढ़वाल जिले में आता है पर ऋषिकेश से सटे होने की वजह से यह ऋषिकेश में ही देखा जाता है।

इस स्वर्ग आश्रम की स्थापना स्वामी विशुद्धानन्द द्वारा की गई थी। स्वामी विशुद्धानन्द को लोग ‘काली कमली वाले’ नाम से भी जाने जाते हैं। यहाँ हस्तशिल्प की कलाकृति के बेजोड़ नमूने आसानी से नजर आ जाते हैं।

नीलकण्ठ महादेव मन्दिर | Rishikesh

नीलकण्ठ महादेव का मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर वैसे तो पौड़ी गढ़वाल जिले में आता है पर ऋषिकेश से पास होने से भक्त व पर्यटक यहाँ आना नहीं भूलते।

5,500 फीट की ऊँचाई पर एक पहाड़ी चोटी पर स्थित बाबा नीलकण्ठ महादेव का मंदिर अत्यंत सुंदर एंव दर्शनीय है। पौराणिक कथा अनुसार माना जाता है कि भगवान शंकर ने समुद्र मंथन से निकला विष इसी स्थान पर पिया था। विष पीने कारण उनका कंठ नीला पड़ गया जिस कारण वो नीलकण्ठ महादेव के रूप में प्रसिद्ध हुए।

भरत मन्दिर | Rishikesh

धर्मनगरी ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मंदिर भरत मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण 12 वीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने किया था। भगवान श्री राम के छोटे भाई भरत को समर्पित यह मंदिर त्रिवेणी घाट के निकट ओल्ड टाउन में स्थित है। 1398 में मुस्लिम आक्रमणकारी तैमूर ने इस मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया था। भरत मंदिर के अंदरूनी गर्भ गृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा एकल शालिग्राम पत्थर पर उकेरी गई है। आदिगुरु श्री शंकराचार्य द्वारा रखा गया श्री यंत्र भी यहाँ पर्यटकों द्वारा आसानी से देखा जा सकता है।

कैलाश निकेतन मन्दिर | Rishikesh

कैलाश निकेतन मंदिर ऋषिकेश में उपस्थित सभी मंदिरों से भिन्न है। 12 खण्डों में निर्मित इस विशाल मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ विराजमान हैं। दूर से ही आकर्षक व स्पष्ट नजर आने वाला यह मंदिर भीतर से भी उतना ही सुंदर है।

वशिष्ठ गुफा | Rishikesh

बद्रीनाथ – केदारनाथ मार्ग पर ऋषिकेश के से लगभग 22 किलोमीटर दूर एक अति प्राचीन गुफा विश्वविख्यात है। जिसे सभी वशिष्ठ गुफा के नाम से जानते हैं। एक अनुमान के मुताबिक यह वशिष्ठ गुफा लगभग 3,000 साल पुरानी मानी जाती है। ऋषि-मुनि इस गुफा में प्राचीन समय से ही तप करते आ रहे हैं। वर्तमान समय की बात करें तो आज भी कई साधुओं को वहाँ ध्यान मग्न हुए देखा जा सकता है।

गीता भवन | Rishikesh

प्रवचन एंव भक्तिमय कीर्तन की नित्य क्रियाओं वाला गीता भवन सभी आध्यात्मिक पाठकों की पहली पसंद है। भारत की प्राचीन शुद्ध सनातन धर्म की विचार प्रवाह को बनाए रखने में सबसे अधिक योगदान एंव अग्रणी भूमिका निभाने वाली प्रेस गीता गोरखपुर प्रेस की एक शाखा का संचालन भी इसी गीता भवन से होता है। रामायण और महाभारत के किरदारों के चित्रों से सजी इस भवन की दिवारें बड़ी मनमोहक नजर आती हैं।

जौनसार भावर | Jaunsar-Bawar

जौनसार भावर देहरादून जिले का एक बेहद खूबसूरत जनजातीय क्षेत्र है। देहरादून मुख्य शहर से उत्तर – पश्चिम दिशा में स्थित इस क्षेत्र के अन्तर्गत कालसी, चकराता व त्यूनी तहसीलें आती हैं। सामान्यतः यह क्षेत्र यमुना और टौंस नदियों के मध्य में स्थित है। इस क्षेत्र के प्रमुख स्थल हैं

कालसी | Kalsi

जौनसार भाबर क्षेत्र के दक्षिणी भाग में यमुना के किनारे बसा कालसी एक ऐतिहासिक स्थान है। यहाँ पर मौर्य सम्राट अशोक कालीन 257 ई. पूर्व शिलालेख में अशोक के लेख उत्कीर्ण हैं जिसमें प्राकृत भाषा और ब्रह्मी लिपी का प्रयोग किया गया है। यमुना और टौंस नदी के संगम पर बसा कालसी सम्राट अशोक के गौरवशाली इतिहास का भी गवाह है। देहरादून से 56 किमी दूर स्थित कालसी इतिहास में रूचि रखने वालों के लिए एक मजेदार जगह है। यहाँ पर स्थित 1,764 वर्ष पुराने शिलालेख को ध्यान से देखने व अपनी कल्पना शक्ति की मदद से आप इतिहास की झलक देख सकते हैं। यहाँ पहुँच मैंने अपनी उत्सुकता को शांत किया और इतिहास की गहरी खाई में ड़ूब गया।

चकराता | Chakrata

उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून से केवल 90 किमी दूरी पर जौनसार भाबर की मनमोहक वादियों के एकांत में बसा यह पहाड़ी शहर चकराता, एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। बर्फीली पहाड़ी पर उगने वाले शंकुधारी पेड़ों के जंगलों से घिरा चकराता; शहरी जीवन की हलचल व दौड़ – धूप से दूर अपने में ही एक आनंददायी पहाड़ी कस्बा है।

गगनचुंबी पर्वत शिखरों व बर्फ से लदी हिमालयी पर्वतमाला से घिरा चकराता समुद्र तल से 2,118 मीटर की ऊँचाई पर विराजमान है। चकराता की विशाल पर्वत श्रृंखलाएं एंव मंत्रमुग्ध कर देने वाला प्राकृतिक वातावरण दिल को एक अविस्मरणीय एहसास से भर देता है। पर्वतारोहण सहित अन्य कई साहसिक गतिविधियों की पेशकश करती चकराता की पहाड़ियाँ रोमांचक ट्रेकिंग, जंगल कैंपिंग और हिल स्टेशन की परिधि में बसे छोटे-छोटे खूबसूरत गाँवों की सैर करने के लिए पर्यटकों को सदा ही पुकारती रहती है।

पर्वतारोहण में रूचि रखने वाले पर्वतारोही व साहसिक खेलों के शौकीन जिंदादिली पर्यटक चकराता की सबसे ऊँची चोटी खारम्बा (Kharamba peak) पर विजय प्राप्त कर खुद को गर्व से भर सकते हैं। पेशेवर पर्वतारोहियों के लिए खारम्बा (Kharamba peak) पर्वत जो कि 10,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

एडवेंचर के शौकीनों के लिए चकराता आना हमेशा ही फायदे का सौदा साबित होता है। इसके पीछे कारण यहाँ प्रकृति की गोद में हिलोरे लेते खूबसूरत झरने, विशाल गुफाएं, प्राचीन मंदिर, सुन्दर काष्ठकला, दूर से नजर आते बर्फीली पर्वत चोटियाँ, गाँवों से होकर गुजरते ट्रैक आदि एक थकी हुई आत्मा को लुभाने व फिर से तरोताजा करने के लिए पर्याप्त है। 

अपने एकांत और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध चकराता में कुछ ही होटल और लाॅज उपलब्ध हैं।
बैकपैकर और एडवेंचर पसंद लोग खुले आसमान में टिमटिमाते तारों के नीचे तंबू और शिविर लगाकर ही रूकना पसंद करते हैं। चकराता में पर्यटकों की कम आमद के कारण ज्यादा रेस्टोरेंट नहीं हैं। हाँ सड़क किनारे छोटे-छोटे फूड़ स्टाॅल जरूर मिल जाते हैं जहाँ आप स्थानीय व्यंजनों के साथ-साथ चीनी व्यंजनो का भी स्वाद ले सकते हैं।

चकराता शांत वातावरण में भीड़ और प्रदूषण से दूर एक सुरम्य स्थान है। प्राकृतिक उदारता और प्रकृति के मनोरम दृश्यों को समेटे चकराता के पूर्व में प्रसिद्ध मसूरी और पश्चिम में हिमाचल प्रदेश का बहुचर्चित किन्नौर स्थित है। सर्दियों में बर्फ की चादर से ढक जाने वाला चकराता, मानव के भौतिकवादी तनाव से खुद को दूर करने व प्रकृति की रहस्यमयी रचनाओं के बीच खुद को उपस्थित करके ईश्वरीय अनुभूति से सराबोर करने के लिए यह एक सुंदर स्थल है।

एंग्लो-नेपाली युद्ध में सन् 1814 – 1816 तक यहाँ गोरखाओं ने राज किया व बाद में इसे अंग्रेजों ने जीत लिया। दिल्ली के ब्रिटिश निवासियों के अनुरोध पर सन् 1816-17 में चकराता में पहली बस्ती कैप्टन बिर्च द्वारा बनाई गई थी। यहाँ ब्रिटिश भारतीय सेना की 55वीं रेजिमेंट के कर्नल ह्यूम ने 1866 में ब्रिटिश भारतीय सेना की छावनी की स्थापना की। 1901 के आसपास, चकराता तहसील संयुक्त प्रांत के देहरादून जिले का एक हिस्सा हो गया।

टाइगर फॉल्स | Tiger Falls, Dehradun

देहरादून जिले की खूबसूरत पहाड़ी तहसील चकराता जो कि एक सैन्य छावनी के रूप में भी जानी जाती है से कुछ ही दूरी पर स्थित प्रकृति ने इंसानों को भेंट स्वरूप एक खूबसूरत तोहफा दिया है जिसे सभी ‘टाइगर फाल के नाम से जानते हैं।चकराता के खूबसूरत जंगलों में स्थित टाइगर फाल माँ प्रकृति के अनुपम दृश्य को प्रस्तुत करता है। 50 मीटर की ऊँचाई के साथ गिरता यह झरना भारत के सबसे ऊँचे प्रत्यक्ष झरनों में से एक है। झरने का पानी नीचे गिरते ही एक खूबसूरत तालाब में बदल जाता है। जहाँ पर्यटक अक्सर नहाते हुए नजर आ जाते हैं। दोस्तों और परिवार के साथ अच्छा समय बिताने के लिए जगह सबसे उत्तम है।

देहरादून की शहरी हलचल से दूर, टाइगर फाॅल चकराता की पहाड़ी इलाकों के बीच स्थित एक ऐसा शानदार झरना है जो अभी व्यावसायीकरण से अछूता है। न कोई दुकानें, न ज्यादा भीड़ और न आसपास किसी गाड़ी मोटर को शोर-शराबा। एकदम एकांत का एहसास कराता यह झरना शांतिप्रिय लोगों की पहली पसंद है।

घने जंगलों व पहाड़ों के बीच बहता पानी जोर-जोर से मंत्रमुग्ध कर देने वाली ध्वनि उत्पन्न करता है। टाइगर फाॅल तक पहुँचने के लिए पर्यटक चकराता मुख्य बाजार से टैक्सी ले सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ जिन लोगों को ट्रैकिंग पसंद है और जो साहसिक पर्यटन का आनंद लेना चाहते हैं वो चकराता से टाइगर झरने तक 5 किमी के एक आहान ट्रैक से होकर जा सकते हैं जो छावनी के पास चकराता टैक्सी स्टैंड से शुरू होता है और कुछ बस्तियों, खूबसूरत हरे-भरे खेतों, पहाड़ी ढलानों से ले जाते हुए है बर्फ से ढके पहाड़ों का मंत्रमुग्ध कर देने वाला दृश्यों का दीदार कराते हुए आपके टाइगर फाॅल पहुँचा देता है।

टाइगर फाॅल की यात्रा पर्यटकों को रोमांच व शांति दोनो ही एहसास से भर देती है। जगह दुर्गम होने के कारण टाइगर फाॅल पहुँचने के लिए वाहन आसानी से उपलब्ध नहीं होते। इसलिए यात्री चकराता मुख्य बाजार से ही कैब किराए पर ले सकते हैं।

लाखामण्डल – जहाँ पाण्ड़व आए | Lakha Mandal Shiv Temple

उत्तरी भारत का खूसूरत शहर है देहरादून। यहाँ से एक मार्ग सुप्रसिद्ध धाम यमुनोत्री को चला जाता है। इसी मार्ग पर सवा सौ कि.मी. दूर पड़ता है लाखामण्डल गाँव। कुआ नामक बस्ती से यमुना नदी पर लगे पुल को पार करते बमुश्किल 3 कि.मी. की पैदल दूरी तय करके इस गाँव में पहुंचा जा सकता है। वैसे बनीगाढ़ से कच्ची सड़क पर चलकर 7 किलोमीटर बाद भी यहाँ पहुँच सकते हैं।

देहरादून से चलते हैं तो धीरे – धीरे आकाश की ऊचाईयों को छूते सिलसिलेवार पर्वतों के बीच घाटियों से गुजरते हुए बहुत अच्छा लगता है। हरे – भरे खेत बगीचे , झरने , स्थापत्य के पहाड़ी शैली में बने मकान , यमुना नदी का अविरल प्रवाह सभी कुछ चितचोर लगता है। अपनी अनूठी व विशिष्टि परंपराओं तौर तरीकों व जीवन शैली के कारण यह क्षेत्र अलग ही ध्यान खींचता आया है। पांडवों के प्रति अत्यन्त आत्मीय आस्था से जुड़ा यह क्षेत्र जौनसार कहलाता है। लाखामण्डल इस क्षेत्र का प्रमुख व प्रसिद्ध गाँव है। यह गाँव हमेशा ही इतिहास पुरातत्व के शोधकर्ताओं और जानकारों के लिए एक आवश्यक तीर्थ बना रहा है।

यह वही लाखामण्डल गाँव है जिसके बारे में लोकश्रुति है कि यहीं दुर्योधन ने लाक्षागृह बनाकर पांडवों को जिंदा जला देने का षड्यंत्र रचा था। लेकिन संयोगवश एक गुफा से होते हुए पांडव बच निकले थे। लाक्षागृह नाम बिगड़कर लाखामण्डल हो गया। यह बात तब की है जब कौरवों ने पांडवों को बारह वर्ष का वनवास दिया था। तब पांडवों ने इस क्षेत्र में शरण ली थी। हालांकि देश में कई और स्थान ऐसे हैं जिन्हें महाभारतकालीन लाक्षागृह कहा जाता है, लेकिन इतिहासकारों ने अपने शोध में बताया है कि लाखामण्डल महाभारत युगीन संस्कृति का महत्वपूर्ण कद रहा है। महाभारत के आरंभिक विराट पर्व में पाडवों के लाखामण्डल में अज्ञातवास में रहने की पुष्टि के प्रमाण मिलते हैं। इस क्षेत्र के लोग अपने को पांडवों का वंश मानते हैं। यहाँ आज भी बहुपति प्रथा कायम हैं। यहाँ प्राप्त ऐतिहासिक सामग्रियों , मंदिर , मूर्ति कलाकृतियों व गांव होने वाले त्योहारों नृत्यों में भी पांडव संस्कृति के दर्शन होते है। यह भी कहा जाता है कि यहाँ कई राजाओं ने समय – समय पर राज किया और एक समय पर एक लाख से भी ज्यादा मूर्तियां एकत्र की। संभवतया इसी कारण यहाँ का नाम लाखामण्डल पड़ गया हो।

सामाजिक रीति रिवाजों में यहाँ पांडव नृत्य का प्रचलन बदस्तूर चला आ रहा है। इस परम्परागत नृत्य में गाँव की स्त्रियाँ द्रौपदी व पुरुष पांडवों का अभिनय करते हैं। गाँव के सामने एक टीलेनुमा पहाड़ी पर अभी भी 4-5 गुफाएं दर्शनीय हैं। अब यह ऐतिहासिक मंदिर पुरातत्व विभाग के जिम्मे है। विभाग की ओर से 4-5 सुरक्षा कर्मचारी यहाँ नियुक्त हैं। एक कमरे में लगभग 200 दुर्लभ मूर्तियों को कैद कर रखा हुआ है। विशेष अनुरोध पर ही इसे दर्शनार्थ खोला जाता है। अधिकांश मूर्तियों का संग्रह यही आसपास खुदाई से किया गया है । पुरातत्व विभाग द्वारा एक संग्रहालय बनाए जाने की योजना भी है। यह गाँव देहरादून जनपद के अंतर्गत चकराता तहसील में आता है। चकराता यहाँ से 63 किमी दूर है। चकराता तक लाखामण्डल से एक मोटरमार्ग जाता है। उसकी भी कमोबेश यही दयनीय हालत है। लाखामण्डल का अतीत जितना ऐतिहासिक गौरवमय संस्कृति से समृद्ध है ; वर्तमान उतना ही समस्याग्रस्त अभावग्रस्त गाँव में दर्जा 8 तक ही स्कूल है। उससे आगे पढ़ने के लिए नजदीक कहीं हाईस्कूल नहीं है। गाँव अधिकांश लोग इतने सम्पन्न नहीं है कि वे बच्चों को नौगांव या देहरादून पढ़ा सके।

63 परिवारों के इस गाँव के बीचों बीच भव्य कलात्मक मंदिर विशेष दर्शनीय है। मंदिर के पास ही एक कमरे में सैकड़ों मूर्तियां, छत्र अश, शिवलिंग जमा है। मंदिर आगन में जय – विजय की आदमकद मूर्तिया दर्शनीय है। एक विशाल अधूरे मंदिर की आधार शिला, सीढियां व भव्य शिवलिंग भी शोध का विषय बना हुआ है। मंदिर के पास एक काले रंग के चिकने पत्थर पर बना शिवलिंग तो अद्भुत ही है। इसमें पानी डालते ही शीशे के माफिक लोग पत्थर पर अपनी प्रतिछाया देखते हैं। मंदिर परिसर व गोदाम में रखी मूर्तियों में एक से एक बेजोड बेमिसाल मूर्तियों के दर्शन होते हैं। इनमें भीम व अर्जुन से लेकर शिव पार्वती की युगल मूर्तियां विशेष दृष्टव्य हैं।

कुछ इतिहासकार इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि लाखामण्डल ही उत्तरी भारत के पर्वतीय क्षेत्र में मूर्तिकला निर्माण का मशहूर केन्द्र था। मथुरा कला शैली के अंतर्गत निर्मित जिन्दा मूर्तियों की समानता यहाँ की मूर्तियों पर दृष्टिगोचर होती है। ऐतिहासिक तथ्यों की रोशनी में देखें तो भी पता चलता है कि यहाँ व बाडाहाट चौथी और पाँचवी शताब्दी में मूर्तिकला के केन्द्र रहे हैं। पौराणिक संदर्भों से भी लाखामण्डल की कहानी जुड़ी है। कहा जाता है कि यहाँ पार्वती ने पांडवों को रहने के लिए स्थान दिया था। पार्वती ने अपने पैरों के निशान भी एक शिला पर छोड़ दिए थे। आज भी एक शिला जिस पर पैरों स्पष्ट चिन्ह उभरे हुए है मुख्य सरोवर में सुशोभित है।

मुंडाली | Mundali

बर्फ से ढके पहाड़ों के नजारों का आनंद लेने और सर्दियों में स्कीइंग के लिए प्रसिद्ध मुंडाली चकराता के पास सबसे अच्छा पर्यटक स्थल है। चकराता से 36 किलोमीटर की दूरी पर हरे-भरे जंगलों से घिरा यह क्षेत्र अत्यंत रमणीक स्थान है। इसके खूबसूरत अल्पाइन घास की विशाल पहाड़ी ढलानें 2,776 मीटर की ऊँचाई पर पेशेवर स्कीयरों के लिए स्कीइंग की सुविधा प्रदान करती हैं।

मुंडली, सर्दियों में स्कीइंग का बेहतरीन अनुभव लेने के सुनहरे अवसर के साथ-साथ बर्फ से आच्छादित हिमालय की श्रृंखलाओं के सुंदर दृश्य को भी प्रस्तुत करता है। दूसरी तरफ ग्रीष्मकाल में यहाँ से हिमालय का अद्भुत नजारा दिखाई देता है।

कनासार | Kanasar

कानासर घने व हरे-भरे जंगलों से घिरा कानासार चकराता शहर से 26 किमी की दूरी पर एक सुरम्य स्थान है। यहाँ पर पाए जाने वाले हरे भरे घास के मैदान पर्यटकों को आकर्षित करते हैं और इसे चकराता के पास एक बेहतरीन पिकनिक स्थल बनाते हैं। यहाँ पर कोटि कनासर नामक थोड़े बहुत घरों वाला एक छोटा सा गाँव भी है। कानासर अपने जंगल में बहुत पुराने देवदार के पेड़ों के लिए जाना जाता है। यहाँ पर स्थित 6.35 मीटर परिधि वाला देवदार का एक पेड़ एशिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा देवदार का पेड़ माना जाता है। पर्यटक यहाँ से देवबन तक की ट्रैकिंग करना भी पसंद करते हैं। कानासार में स्थित ग्राम देवता का मंदिर स्थानीय लोगों की आस्था और भक्ति का केंद्र है।

गांव से 3 किमी की दूरी पर एक पहाड़ी चोटी पर बना वन विश्राम गृह उत्कृष्ट पहाड़ी दृश्य प्रदान करता है।

बुधेर गुफाएँ | Budher Caves

इतिहास की गर्त में छिपे अनगिनत रहस्यों को समेटे जौनसार भाबर क्षेत्र की ऐतिहासिक बुधेर गुफा व मोईला टॉप चकराता तहसील के सबसे रोमांचक पर्यटन स्थलों में से एक है। चकराता से लगभग 18 किमी चलने पर एक बेहद खूबसूरत व छोटा सा गाँव लोखण्डी आता है। यहाँ से 148 साल पुरानी ऊबड़-खाबड़ सड़क पर आगे बढते हुए जिसे आखिरी बार शायद अंग्रेज़ी हुकुमत ने ही बनवाया होगा व देवदार, कैल, सुरई के घने जंगलों से होकर जब आप बुधेर में सन् 1868 ई में अंग्रेजों के द्वारा बनाए वन विश्राम भवन पहुँचते हैं तो आपकी सारी थकान गायब हो जाती है। देवदार के घने जंगल, वन्यजीवों एंव कई वनस्पतियों वाले वातावरण के बीच निर्मित किया गया यह अत्यंत रमणीक वन विश्राम गृह, उत्तराखण्ड के प्राचीनतम ब्रिटिशकालीन विश्राम गृहों में से एक है।

जंगल में सैर करने व बुधेर के आसपास की प्राकृतिक सुंदरता को निहारने के लिए बुधेर वन विश्राम भवन से कई रास्ते चारों तरफ निकलते हैं। यहीं से एक छोटा सा रास्ता निकलता है मोइला टाॅप के लिए। मोइला टॉप एक छोटा सा बुग्याल है। हरी, मखमली घास के मैदान को देख मन एक जगह मानो थम सा जाता है। बुधेर से मोइला टाॅप का रस्ता लगभग 3 किमी का है। 2523 मीटर की उँचाई पर स्थित मोइला टाॅप जाड़ों में बर्फ से ढक जाता है। बर्फ़बारी के मौसम में यहाँ घूमने का अलग ही आनंद है। एक अनुमान के आधार पर यहाँ 7-8 फिट बर्फ़ पड़ जाती है। यह उत्तराखण्ड के सबसे एकांत पर्यटन स्थलों में से एक है। जौनसार भाबर के भ्रमण में निकले घुमक्कड़ ही यहाँ आ पाते है। यह जगह प्रकृति प्रेमी लोगों को अपनी ओर खींच हो लेती है।

कहा जाता है कि एक जर्मन लेड़ी मिओला व ब्रिटिश वाइल्ड लाइफ प्रेमी बोथर जोड़े ने इस जगह को ढूँढा। काफी समय बाद जब इस जगह का सर्वे किया गया तो यह स्थान उन्हीं के नाम से जाना जाने लगा। बाद में इनके नामों के अपभ्रंश के कारण ‘बोथर’ का बुधेर हो गया और ‘मिओला’ का मोइला हो गया! इन्हीं के नाम से बुधेर गुफा (बोथर केव), व मोइला टिम्मा या मोइला टॉप प्रसिद्ध हुआ।

इस गुफा को लेकर कई किवदंतियाँ सुनने में आती है जिनमें से कुछ कहती हैं कि इस गुफा का संबंध
पाण्डव कालीन लाक्षागृह (लाखामण्डल) से है। जिसे पांडवों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बनाया गया था। अन्य मत के अनुसार इस गुफा का निर्माण कनासर देवता के द्वारपाल बुधेर ने पाण्डवों के यहाँ से सुरक्षित निकलने के लिए किया। सत्य क्या है ये तो कोई नहीं कह सकता। लेकिन प्रचलित कहानियाँ इस गुफा के रहस्यमयी होने का प्रमाण जरूर देती हैं।

बुधेर गुफा की गहराई की बात करें तो यह लगभग 150 से 200 किमी लम्बी बताई जाती है। जिसका कोई प्रमाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

देववन | Deoban

जौनसार भाबर के केंद्र चकराता से मात्र 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित देववन एक सुरम्य पर्यटन स्थल है। देवदार के पेड़ों से आच्छादित घने जंगलो के बीच लगभग 3025 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है देववन, जहाँ से पर्वत राज हिमालय का बेहद ही खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है। देवदार के जंगलों से होकर से लगभग 15 मिनट का पैदल ट्रैक करके पर्यटक ‘व्यास शिखर’ तक पहुंच सकते हैं। व्यास शिखर देववन की सबसे ऊँची चोटी है और वहाँ से हिमालय का जो अद्भुत दृश्य दिखाई देता है वो कहीं और से नजर नहीं आता। माना जाता है कि महर्षि व्यास ने महाभारत महाकाव्य की रचना इसी शिखर पर की थी। अतः उन्हीं के नाम से इस शिखर को व्यास शिखर के नाम से जाना जाने लगा। देवदार के पेड़ों के घने जंगल से घिरे, देवबन में पक्षियों और जानवरों की एक विस्तृत प्रजाति भी पाई जाती है। पक्षी प्रेमियों को इसका घना देवदार का जंगल खूब आकर्षित करता है। सफेद कॉलर वाले ब्लैकबर्ड (White Collared Blackbird) और हिमालयी कठफोड़वा (Himalayan woodpeckers) कुछ ऐसे पक्षी हैं जो यहाँ आसानी से नजर आ जाते हैं। पक्षियों का सुंदर प्राकृतिक संगीत यहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर देता है। Bird Watching पसंद लोगों को कैमरे के साथ यहाँ एक बार जरूर आना चाहिए। सर्दियों के मौसम में प्रवासी पक्षियों को देखने यहाँ लोग दूर – दूर से आते हैं। देवदार के पेड़ों के बीच हरे-भरे घास के मैदान अविस्मरणीय मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

रामताल गार्डन | Ram tal Horticultural Garden

रामताल बागवानी उद्यान एक छोटा पर बेहद खूबसूरत दर्शनीय उद्यान है जो कि एक तालाब के पास स्थित है। मुख्य चकराता शहर से मसूरी रोड पर 12 किमी की दूरी पर स्थित इस रामताल गार्डन में सेब, पुलम व बुराँस के कई पेड़ हैं। प्रवासी व स्थानीय पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों का बसेरा यह गार्डन बर्ड़ वाचिंग के लिए बेहद अनुकूल जगह है। चकराता की खूबसूरती पर चार चाँद लगाता रामताल गार्डन अनुपम सौंदर्य को संजोए है। ग्लोबल वार्मिंग व पर्यावरण प्रदूषण के कारण यहाँ पर स्थित तालाब ज्यादातर समय सूखा ही रहता है परंतु बरसात के मौसम यह देखने  में बड़ा ही प्यारा नजर आता है। हिमालय की पर्वतीय चोटियों के सुंदर दर्शन का लुत्फ यहाँ से बखूबी उठाया जा सकता है।

महासू देवता मंदिर, हनोल | Mahasu Devta Temple

उत्तराखण्ड राज्य के जनजाति क्षेत्र जौनसार-भाबर के सुदूर पश्चिमी छोर पर यमुना की सहायक नदी तमसा (टौंस) नदी के पूर्वी किनारे पर चकराता से 110 किमी दूरी पर हनोल ग्राम में स्थित महासू देवता का प्राचीन मंदिर जौनसार भाबर क्षेत्र में सबसे पवित्र देवता माने जाने वाले बोटा महासू (महासू का सबसे बड़ा भाई) को समर्पित है। यह जौनसार भाबर के लोगों का सबसे बड़ा तीर्थस्थल है। यहाँ महासू देवताओं का सबसे बड़ा मंदिर है। महासू देवता चार देवताओं का सामूहिक नाम है। दरअसल ‘महासू देवता’ एक नहीं चार देवताओं का सामूहिक नाम है और स्थानीय भाषा में महासू शब्द ‘महाशिव’ का अपभ्रंश है। चारों महासू भाइयों के नाम बासिक महासू, पबासिक महासू, बूठिया महासू (बौठा महासू) और चालदा महासू है, जो कि भगवान शिव के ही रूप हैं। मैंद्रथ नामक स्थान पर बासिक महासू की पूजा होती है। छोटा भाई चाल्दा महासू भ्रमण प्रिया देता है। हनोल मंदिर तीन कक्षाओं में बटा हुआ है। महासू देवता का त्यौहार जागड़ा है। मंदिर के अंदर चांदी के चादर पर चारो महासू व माता देवलाड़ी के चित्र बनाये गये हैं। बाहर ‘छारिया’, अंगारिया आदि अनेक देवों की मूर्तियां हैं।
        समतल धरातल पर स्थित इस मंदिर का शिखर नागर शैली में निर्मित है। वास्तुकला की दृष्टि से मंदिर के निर्माण को 9वीं-10वीं शताब्दी ईश्वी के मध्य रखा जा सकता है। इस मंदिर की वास्तुकला प्रस्तर और लकड़ी के सामंजस्यपूर्ण मिश्रण के दुर्लभ उदाहरणों में से एक है जो एक समग्र भव्य भवन का निर्माण करता है। यह मंदिर देहरादून सर्कल, उत्तराखंड में प्राचीन मंदिर की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सूची में शामिल है।

देहरादून के मुख्य मंदिर | Famous temples of Dehradun

साहसिक व ईको टूरिज्म के साथ-साथ देहरादून में धार्मिक पर्यटन के भी अनेक स्थान हैं जहाँ संपूर्ण भारत से लोग यात्रा कर पहुँचते हैं। मध्य व शिवालिक हिमालय की दून घाटी में बसा यह सुंदर जिला, उत्तराखण्ड की देवभूमि के स्वरूप को कई रूपों में सार्थकता प्रदान करता है। देहरादून की सुदूर पश्चिमी सीमा जहाँ पवित्र यमुना नदी बनाती है जो उत्तराखण्ड व हिमाचल प्रदेश को अलग करती है वहीं पूर्व में ऋषिकेश से होकर गुजरती माँ गंगा का आशीर्वाद भी देहरादून को स्वतः ही प्राप्त हो जाता है। वहीं दूसरी ओर दक्षिण में माँ डाट काली देहरादून में प्रवेश करने वाले सभी यात्रियों को अपना आशीर्वाद हर घड़ी प्रदान कर रही है तो पश्चिम में टौंस नदी के किनारे हनोल में स्थित महासू देवता सभी भक्तों की मनोकामनाओं को सदा पूर्ण करते ही रहते हैं। देहरादून के मुख्य मन्दिर एंव धार्मिक स्थल की इस कड़ी में हम देहरादून में स्थित सभी मंदिरों व धार्मिक स्थलों के विषय में जानेगें। तो आइए शुरू करते हैं।

टपकेश्वर महादेव | Tapkeshwar Temple | Dehradun

टपकेश्वर – शिव का प्राचीन धाम

देवभूमि उत्तराखण्ड के कण-कण में देवों का वास है। यह भूमि देव तपस्थलि है। हिन्दू व सनातन धर्म में हिमालय में कैलाश पर्वत को शिव का धाम माना गया है। लेकिन देवभूमि की समस्त पहाड़ी चोटियाँ व मैदानी भाग बाबा शिव के मंदिरों से सजे हुए मिलते हैं। इसी प्रकार का शिव मंदिर स्थित है उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में। यह मंदिर टपकेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है जो कि देहरादून के मुख्य चौराहे घण्टा घर से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर गढ़ी कैंट इलाके में पड़ता है। टपकेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर, उत्तराखण्ड के प्राचीनतम शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। देहरादून की खूबसूरत पहाड़ी ढालों पर घने जंगलों के बीच स्थित यह शिव मंदिर अति रमणीक स्थलों में से एक है। हर साल देश-विदेश से लाखों शिव भक्त बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने हेतु टपकेश्वर महादेव के मंदिर में आते हैं।

टपकेश्वर मंदिर का इतिहास एंव जनश्रुतियाँ

टपकेश्वर मंदिर के प्राचीन इतिहास की बात करें तो इस मंदिर को महाभारत काल से जोड़ा जाता है। ऐसी मान्यता है की टपकेश्वर महादेव में पांडवों एवं कौरवों के राजगुरु द्रोणाचार्य का आश्रम हुआ करता था। यही वह स्थान है जहाँ द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का जन्म हुआ। द्रोणाचार्य के जन्म के बाद बाल्यकाल अवस्था में अश्वत्थामा के लिए दूध की कमी थी। जब अश्वत्थामा की माता उसके लिए दूध उपलब्ध कराने में असमर्थ थी व अश्वत्थामा की दूध पीने की इच्छा पूरी ना हो सकी तो उसने भगवान शिव की घोर तपस्या की। भगवान शिव अबोध बालक के इस कठिन तपस्या से प्रसन्न हुए एवं उन्होंने वहीं स्थित पर्वत की ओट से दूध की धारा उत्पन्न कर दी। आज भी मंदिर के गर्भ गृह में स्थित गुफा से पानी की बूँदे लगातार टपकती रहती हैं। यही कारण है कि इस मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता भी है कि अश्वत्थामा को अमर होने का वरदान इसी स्थान पर प्राप्त हुआ था।

महाशिवरात्रि पर टपकेश्वर महादेव विशेष मान्यता

भोलेनाथ के महापर्व महाशिवरात्रि के दिन टपकेश्वर महादेव के दर्शन करने की सबसे ज्यादा मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि जो भक्तगण महाशिवरात्रि के दिन टपकेश्वर महादेव में बाबा शिव के दर्शन करते हैं एवं सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं, उनकी मनोकामनाएं जरूर पूरी होती हैं। यही कारण है कि महाशिवरात्रि के दिन शिव के धाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ होती है, एवं देश के कोने कोने-कोने से सभी शिव भक्त बाबा के दर्शन हेतु देहरादून के इस पावन स्थल पर पहुंचते हैं। हर-हर महादेव के जयकारों से महाशिवरात्रि के दिन टपकेश्वर महादेव में एक उत्सव का माहौल होता है। इस मौके पर टपकेश्वर महादेव की मंदिर समिति द्वारा महाशिवरात्रि के दिन एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी शिवभक्त बड़ी संख्या में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं। देहरादून के अंदर भोलेनाथ का यह एक बड़ा उत्सव माना जाता है जिसकी संपूर्ण देश में मान्यता है।

मुख्य शहरों से दूरी –

हरिद्वार से - 62.4 Km
दिल्ली से - 271 Km
हल्द्वानी से -  271 Km
चण्ड़ीगढ से 227 Km

टपकेश्वर महादेव मंदिर कैसे पहुँचे –

उत्तराखण्ड के पश्चिमी छोर पर देहरादून जिले में आसन नदी के तट पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर, टपकेश्वर महादेव आप बस, ट्रेन, फ्लाइट व अपने निजी वाहन से पहुँच सकते हैं। विभिन्न माध्यमों से आप टपकेश्वर मंदिर कैसे पहुँच सकते हैं, यह नीचे विस्तार से बताया जा रहा है

हवाई जहाज से | By Flight

अगर आप हवाई यात्रा करके टपकेश्वर मंदिर पहुँचना चाहते हैं तो देहरादून शहर से निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट (देहरादून) है। जो देहरादून मुख्य शहर से लगभग 26 किमी की दूरी पर स्थित है। जौलीग्रांट हवाई अड्डा से आप बस या कैब के माध्यम से देहरादून पहुँच सकते हैं। जहाँ से आपको टपकेश्वर मंदिर जाने के लिए सीधे बस या विक्रम की सुविधा मिल जाएगी।

ट्रेन | By Train

यदि आप देहरादून में स्थित टपकेश्वर मंदिर की यात्रा रेलगाड़ी के माध्यम से करना चाहते हैं तो आपको दिल्ली व अन्य शहरों से सीधी रेल देहरादून के लिए मिल जाऐगी। देहरादून रेलवे स्टेशन से आप टैक्सी या आटो रिक्शा पकड़कर टपकेश्वर मंदिर जो कि देहरादून रेल्वे स्टेशन से 7.3 किमी की दूरी पर स्थित है आसानी से पहुँच सकते हैं।

बस से | By Bus

बस से सफर करने वाले यात्रियों को दिल्ली, हरिद्वार, हल्द्वानी, नजीबाबाद आदि स्थानों से सीधा देहरादून के लिए बस मिल जाएगी और देहरादून से टैक्सी वगैरह की सुविधा लेकर टपकेश्वर मंदिर आसानी से पहुँच सकते हैं। 

टपकेश्वर मंदिर आने का सबसे अच्छा मौसम | Best season to visit Tapkeshwar Temple, Dehradun

यूँ तो आप किसी भी महीने में टपकेश्वर मंदिर के दर्शन कर सकते हैं। यह सभी महीनों में सामान्य रूप से खुला रहता है, परंतु गर्मियों एवं सावन के महीने में टपकेश्वर महादेव के दर्शन करना सबसे उचित माना जाता है। गर्मियों में यहाँ का मौसम सुहावना रहता है जो कि यात्रियों को खूब पसंद आता है, एवं महाशिवरात्रि के दौरान शिव के दर्शन मात्र से मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु यात्री इस महीने में यात्रा करना अधिक पसंद करते हैं।

माँ डाट काली मंदिर | Dehradun

माँ डाटकाली मंदिर – 9 शक्तिपीठों में से एक

देवभूमि उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के दक्षिणी-पश्चिमी छोर पर दिल्ली – देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 307 के किनारे पर स्थित है। माँ डाट काली का यह मंदिर 9 शक्तिपीठों में से एक है। यह दिव्य शक्ति पीठ माँ काली को समर्पित है। उत्तराखंड की खूबसूरत शिवालिक दून घाटी मैं स्थित माँ काली का या खूबसूरत मंदिर संपूर्ण उत्तराखंड के साथ-साथ पूरे देश में विख्यात है। माँ काली के भक्त श्रद्धा भाव से संपूर्ण देश के कोने-कोने से यहाँ आते हैं। देहरादून शहर के मुख्य चौराहे घंटाघर से माता काली का मंदिर 14.7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह शक्तिपीठ संपूर्ण देहरादून जिले का एक मुख्य धार्मिक स्थल है यहाँ के लोगों की माँ डाट काली पर असीम श्रद्धा है, एवं अपने छोटे बड़े सभी आयोजनों में यहाँ के लोग माँ डाट काली का आह्वान करते हैं, एवं उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

माँ डाट काली मंदिर स्थापना की अनोखी कहानी

प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर कहा जाता है कि माँ माँ डाट काली के इस दिव्य मंदिर का निर्माण आज से 218 वर्ष पूर्व 18वीं शताब्दी में सन 1804 ई. को किया गया था। मंदिर निर्माण की कहानी कुछ ऐसी है कि जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश से अंग्रेज दून घाटी में प्रवेश कर रहे थे तब उनके अधिकारियों को रास्ते में एक मजबूत चट्टान देखने को मिली। इस चट्टान को काटने में असमर्थ रहने पर अंग्रेजों द्वारा चट्टान खोदकर सुरंग बनाने का फैसला किया गया। अतः सुरंग बनाते समय काफी अंदर जाने पर अंग्रेज अफसरों के कर्मचारियों को माँ काली की एक सुंदर मूर्ति खुदाई के समय प्राप्त हुई। कर्मचारियों द्वारा मूर्ति को सामान्य मानकर एक अन्य स्थान पर रख दिया गया एवं खुदाई जारी करने का निश्चय किया गया। परंतु बार-बार खुदाई करने में अड़चनें आने लगी। इससे अंग्रेज अफसर परेशान हो चुके थे। ऐसा माना जाता है कि एक रात अंग्रेज अफसर के सपने में माँ काली ने दर्शन दिए एवं उस अंग्रेज अफसर से एक उचित स्थान पर माँ काली का मंदिर बनाने का आदेश दिया। माँ के आदेश अनुसार उस अंग्रेज अफसर ने वर्तमान स्थान पर माँ काली का मंदिर स्थापित किया। कहा जाता है कि एक गोरखा सेनापति बलभद्र थापा ने भी यहीं पास में भद्रकाली मंदिर की स्थापना की थी। इसलिए वर्तमान डाट काली मंदिर के निकट ही एक प्राचीन भद्रकाली मंदिर भी स्थित है। भक्तों का मानना है कि आज भी माँ डाट काली का शेर आज भी शिवालिक पर्वत श्रेणियों में घूमता रहता है।

माँ डाट काली की शक्ति एंव मान्यता

माँ डाट काली दून घाटी की अधिष्ठात्री है। यह मंदिर माँ सती के 9 शक्तिपीठों में से प्रमुख शक्तिपीठ है। भक्तों की ऐसी मान्यता है कि माँ काली से सच्चे मन से की गई प्रार्थना माँ जरूर सुनती है, एवं भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूरी करती है। नवरात्रों में माँ डाट काली के इस पावन मंदिर पर हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। दूर-दूर से माता रानी के भक्त यहाँ माता की पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं एवं अपनी मनोकामनाओं के लिए माँ से प्रार्थना करते हैं।

नया वाहन खरीदने पर भक्तों पहले यहां आते हैं

माता की शक्ति एवं माँ पर अटूट श्रद्धा एवं विश्वास के कारण संपूर्ण दून घाटी एवं आसपास के जिलों से श्रद्धालु जब भी कोई नया वाहन या काम शुरू करते हैं तो सबसे पहले माँ डाट काली का आशीर्वाद लेने देहरादून की इस पावन धरती पर माँ का आशीर्वाद लेने आते हैं। अक्सर डाट काली के मंदिर में नए वाहनों की पूजा होते हुए आसानी से देखी जा सकती है।

मुख्य शहरों से दूरी –

दिल्ली - 255Km
हरिद्वार - 66.4 Km
चण्ड़ीगढ - 211 Km
हल्द्वानी - 275 Km

माँ डाट काली मंदिर कैसे पहुँचे –

उत्तराखण्ड के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर देहरादून जिले में पर दिल्ली – देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 307 के किनारे पर स्थित प्राचीन शक्तिपीठ माँ डाट काली मंदिर आप बस, ट्रेन, फ्लाइट व अपने निजी वाहन से पहुँच सकते हैं। विभिन्न माध्यमों से आप माँ डाट काली कैसे पहुँच सकते हैं, यह नीचे विस्तार से बताया जा रहा है

हवाई जहाज से | By Flight

अगर आप हवाई यात्रा करके माँ डाट काली पहुँचना चाहते हैं तो देहरादून शहर से निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट (देहरादून) है। जो देहरादून मुख्य शहर से लगभग 26 किमी की दूरी पर स्थित है। जौलीग्रांट हवाई अड्डा से आप बस या कैब के माध्यम से देहरादून पहुँच सकते हैं। जहाँ से आपको माँ डाट काली जाने के लिए सीधे बस या विक्रम की सुविधा मिल जाएगी।

ट्रेन | By Train

यदि आप देहरादून में स्थित माँ डाट काली की यात्रा रेलगाड़ी के माध्यम से करना चाहते हैं तो आपको दिल्ली व अन्य शहरों से सीधी रेल देहरादून के लिए मिल जाऐगी। देहरादून रेलवे स्टेशन से आप टैक्सी या आटो रिक्शा पकड़कर टपकेश्वर मंदिर जो कि देहरादून रेल्वे स्टेशन से 12.8 किमी की दूरी पर स्थित है, आसानी से पहुँच सकते हैं।

बस से | By Bus

बस से सफर करने वाले यात्रियों को दिल्ली, हरिद्वार, हल्द्वानी, नजीबाबाद आदि स्थानों से सीधा देहरादून के लिए बस मिल जाएगी और देहरादून से टैक्सी वगैरह की सुविधा लेकर माँ डाट काली आसानी से पहुँच सकते हैं। 

चन्द्रबनी | Chandrabani Temple

महर्षि गौतम ने इस स्थान में अपनी सहधर्मिणी अहिल्या एवं पुत्री अंजनी के साथ लगभग 12 वर्ष तक कठिन तपस्या की थी । यहाँ गौतमकुण्ड है, जिसमें लोग पवित्र स्नान करते हैं।

चार सिद्ध

  1. लक्ष्मण – सिद्ध यह मंदिर देहरादून से पूरब 11 किमी की दूरी पर जंगल में है। वैसे तो यहाँ प्रत्येक रविवार को भीड़ लगती है, लेकिन अप्रैल के अंतिम रविवार को विशेष मेला लगता है।
  2. कालू सिद्ध यह – स्थल भानियावाला से 4 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ लोग पुत्र हेतु मंगत माँगते हैं।
  3. माणक सिद्ध- यह स्थल देहरादून से पश्चिम की ओर भुड्डी गांव के पास स्थित है। यहाँ प्रत्येक रविवार को भीड़ लगती है।
  4. माॅणू सिद्ध – यह स्थल भी देहरादून से पश्चिम प्रेमनगर के पास स्थित है।

संतला देवी मंदिर | Dehradun

प्रदेश के कोने-कोने में देवी देवताओं के मंदिरों से पटे होने के कारण एवं अपने धार्मिक महत्व के कारण देव भूमि उत्तराखण्ड संपूर्ण देश में प्रसिद्ध है। पहाड़ों पर यात्रा करते समय यात्रियों को अमूमन पहाड़ी चोटियों पर अनायास ही मंदिर नजर आ जाते हैं। उत्तराखण्ड देवभूमि की राजधानी देहरादून से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित माँ संतला देवी का मंदिर ऐसा ही पौराणिक एवं ऐतिहासिक मंदिर है। देश के कोने कोने से भक्त यहाँ अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करने आते हैं। इस मंदिर की मान्यता है कि माँ सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी करती है।

मंदिर स्थापना का इतिहास

ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं के अनुसार 11वीं शताब्दी में नेपाल के राजा की पुत्री संतला देवी से एक मुगल सम्राट विवाह करना चाहता था। परंतु नेपाल के राजा की पुत्री संतला को यह विवाह मंजूर नहीं था। वह अपने हिंदू धर्म को नहीं छोड़ना चाहती थी, एवं इन सब से घबराकर वह नेपाल से भाग निकली। उबड़-खाबड़ बीहड़ पहाड़ियों से होते हुए वह उत्तराखण्ड देहरादून शहर के पंजाबीवाला में एक पर्वत शिखर पर छिपकर निवास करने लगी। कुछ समय पश्चात मुगलों को इस बात का पता चल गया। अतः वह अपनी सेना के साथ पंजाबीवाला पर्वत शिखर को घेरने निकल पड़े। संतला देवी के साथ उनका भाई भी इस पर्वत शिखर पर चुप कर रहा था। मुगलों द्वारा इस पर्वत को घेरने पर जब संतला व उसके भाई को यह एहसास हुआ कि वह मुगलों का सामना नहीं कर सकते तो उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना करनी शुरू कर दी। ऐसी जनश्रुति है कि तभी आसमान से कुछ चमक उठी एवं तेज रोशनी से कुछ दिव्य शक्ति ने चमत्कार किया एवं संतला देवी व उसका भाई पत्थर की मूर्ति बन गए तथा पर्वत शिखर को घेरने आए सभी मुगल सैनिक अंधे हो गए। तत्पश्चात इस पर्वत शिखर पर संतला देवी का मंदिर निर्माण किया गया एवं उन्हें देवी के रूप में संपूर्ण आस्था के साथ पूजा जाने लगा। ऐसी भी कहानी है कि पूर्व में ब्रिटिश राज के समय एक अंग्रेज अफसर जो कि निसंतान था वह किसी के बताए जाने पर संतला देवी के मंदिर में आया एवं माँ की पूर्ण आस्था के साथ पूजा अर्चना की। इसके बाद उसे संतान प्राप्ति हुई। उसके बाद निसंतान दंपत्ति यहाँ माता रानी से संतान प्राप्ति के लिए मनोकामना पूरी करने आने लगे।

कैसे पहुँचे –

संतला देवी मंदिर पहुंचने के लिए सर्वप्रथम आपको देहरादून आना होगा। उसके बाद देहरादून से गढ़ी कैंट होते हुए जैतूनवाला तक सुंदर प्राकृतिक दृश्यों के बीच बस के माध्यम से पहुँच सकते हैं। जैतूनवाला से 2 किलोमीटर दूर मंदिर तक यात्रियों को पैदल यात्रा करनी पड़ती है।

श्री गुरु रामराय दरबार साहिब | Guru Ram Rai Darbar Sahib

देहरादून नगर के संस्थापक और उदासीन परम्परा के गुरू रामराय ने सन् 1699 में धामावाला में झण्डा दरबार (गुरूद्वारा) की स्थापना की। तत्कालीन मुगलशैली में निर्मित इस भवन को सन् 1707 में उनकी पत्नी माता पंजाब कौर द्वारा भव्यरूप में निर्मित किया गया।

देहरादून में स्थित विद्यालय | School located in Dehradun

  • स्कूल
  • सेंट जार्ज कॉलेज
  • वेलहेम गर्ल्स हाईस्कूल
  • लंढौर लैंग्वेज स्कूल
  • वाइन वर्ग ऐलन स्कूल
  • ओकग्रोव स्कूल
  • वुडस्टाक स्कूल
  • कान्वेंट ऑफ जीसस एण्ड मैरी
  • महादेवी कन्या पाठशाला
  • कर्नल ब्राउन कैम्ब्रिज स्कूल
  • द एशियन स्कूल
  • सेन्ट जोसेफ एकेडमी
  • द दून कॉलेज
  • वेलहेम ब्याज स्कूल
  • बाइटलैंड स्कूल
  • श्री गुरू राम राय

देहरादून में स्थित महाविद्यालय | Colleges located in Dehradun

  • महाविद्यालय
  • ड़ी• ए• वी कालेज
  • दून कालेज
  • Doon College of Medical Sciences and Hospital
  • Combined P.G. Institute of Medical Science and Research
  • देहरादून आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज
  • उत्तराखण्ड आयुर्वेदिक कालेज

देहरादून में स्थित विश्वविद्यालय | Universities located in Dehradun

  • विश्वविद्यालय
  • हिमगिरी नभ विश्वविद्यालय
  • ICFAI (Institute of financial analysis of Indian University)
  • स्वामीराम हिमालयन विश्वविद्यालय
  • माधोसिंह तकनीकी विश्वविद्यालय
  • उत्तराखण्ड़ आयुर्वेद विश्वविद्यालय
  • चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय
  • दून विश्वविद्यालय
  • उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय
  • हेमवतीनन्दन बहुगुणा उत्तराखण्ड मेड़िकल शिक्षा विश्वविद्यालय
  • हिमगिरी जी विश्वविद्यालय
  • पेट्रोलियम एंव ऊर्जा विश्वविद्यालय
  • ग्राफिक एरा हिल विश्वविद्यालय
  • डीआईटी विश्वविद्यालय
  • आईएमएस यूनियन विश्वविद्यालय
  • उत्तरांचल विश्वविद्यालय
  • श्री गुरु राम राय विश्वविद्यालय

देहरादून में स्थित उच्च शिक्षा के राष्ट्रीय स्तर के संस्थान | National Level Institute of Higher Education located in Dehradun

  • उच्च शिक्षा के राष्ट्रीय स्तर के संस्थान
  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय फारेस्ट अकादमी
  • इण्डियन मिलिट्री अकादमी

देहरादून में स्थित डीम्ड विश्वविद्यालय | Deemed University located in Dehradun

  • डीम्ड विश्वविद्यालय
  • फाॅरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट डीम्ड विश्वविद्यालय
  • ग्राफिक एरा डीम्ड विश्वविद्यालय

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